Tuesday, March 5, 2013


जब होगा सबेरा
मेरे/हमारे/हमसबके
अंतर्मन का
तब शायद
दूर होगा
ये अँधियारा,,,,,
जो फैल चूका है
कोहरे के मानिन्द
हर गली और कूचे तक
हो चुकी है दफ़न
इंसानियत तक
ख़त्म हो चुकी है रफाकत
नजर भी नहीं आती अकीदत
हाँ /नजर आती हैं जरुर
कुछ सुर्खियाँ
बलात्कार/व्याभिचार की
अत्याचार/अनाचार की
तो क्या
क्या वाकई बुझ गई है
रौशनी/और छा गई है
तीरगी ?
क्या टिमटिमाता हुआ
एक दीया भी नहीं
दिखता ?
हाँ, जरुर दिखता है
सुबह के उस आगाज में
जिसका अंजाम
जरुर स्पर्श करेगा
हमारे अंतर्मन को
और रंग उस तस्वीर में
ही भरेगा
जिसे हम कहते है
उम्मीद,इन्तेजार
सुकून और शांति का
ख़ुशी और अमन का,,,,,,,,,

राजेश कुमार सिन्हा
(रफाकत -मैत्री,अकीदत-श्रद्धा,तीरगी-अँधेरा)

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