Tuesday, March 5, 2013

भूल

हाँ, हुई थी एक भूल मुझसे 
समझने की 
खुद को खुदा,,,,
मानने की 
खुद को जमाने 
से जुदा,,,,
बन बैठा था मै 
भाग्यविधाता 
कैसा रिश्ता 
कैसा नाता,,,,,
जोड़/तोड़/जुगाड़
मूल मंत्र थे मेरे
चाटुकारों की फ़ौज
रहती थी मुझे घेरे
मेरे लिए तो सब थे
बस शतरंज के मोहरे,,,,
ध्येय स्पष्ट था
"स्व" की प्रगति
साध्य नीति हो या अनीति,,,
वक़्त तो मानो मेरी
मुठ्ठी में कैद था
उसकी क्या अहमियत ?
पर शायद यहीं भूल हुई
नहीं जान पाया मै
वक़्त की असलियत,,,,,
और खा गया धोखा
एक तथाकथित
नामचीन निष्णात
वक़्त के समीकरण से
क्योंकि अजीब है
इसका अंकगणित ,,,,,,,
जहाँ फार्मूला की
पुनरावृति
सदैव काम नहीं
आती,,,,,,,,,
राजेश कुमार सिन्हा

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