थकीथकी सी चाहत
अब उम्मीद का दामन
छोड़ चुकी है
जेहन में कौंधते
सवालों को
अब जबाब का
इन्तेजार नहीं
सोते/जागते आने वाले
ख्यालों को
अब रूबरू होना
मुमकिन नहीं
बेशक कोई शिकवा
नहीं/हो भी क्यों ?
जब मुकद्दस रिश्ता
ही/खुद को
सवालिया निगाहों से
देखता हो /तो
बाकी सारे एहसास
बेमानी हैं,,,,,,,,,
राजेश सिन्हा
02/03/2013
अब उम्मीद का दामन
छोड़ चुकी है
जेहन में कौंधते
सवालों को
अब जबाब का
इन्तेजार नहीं
सोते/जागते आने वाले
ख्यालों को
अब रूबरू होना
मुमकिन नहीं
बेशक कोई शिकवा
नहीं/हो भी क्यों ?
जब मुकद्दस रिश्ता
ही/खुद को
सवालिया निगाहों से
देखता हो /तो
बाकी सारे एहसास
बेमानी हैं,,,,,,,,,
राजेश सिन्हा
02/03/2013
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