Monday, March 4, 2013

मेरी नज्म-3

थकीथकी सी चाहत 
अब उम्मीद का दामन 
छोड़ चुकी है 
जेहन में कौंधते 
सवालों को 
अब जबाब का 
इन्तेजार नहीं 
सोते/जागते आने वाले 
ख्यालों को 
अब रूबरू होना 
मुमकिन नहीं
बेशक कोई शिकवा
नहीं/हो भी क्यों ?
जब मुकद्दस रिश्ता
ही/खुद को
सवालिया निगाहों से
देखता हो /तो
बाकी सारे एहसास
बेमानी हैं,,,,,,,,,
राजेश सिन्हा
02/03/2013

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