Monday, March 4, 2013

मेरी नज्म-2

अजीब आलम था वो 
दिन के उजालों में ही 
कुछ ख्वाब बुन लिए थे मैंने 
रफ्ता रफ्ता 
उनके करीब भी जा पहुंचा 
मानो/ मुट्ठी में कैद 
हो गए हों 
चंद लम्हे 
थम सा गया था 
वक़्त/की अचानक 
यादों ने बगावत का
बिगुल फूंक दिया
जैसे/कंपकपाती ठंड में
किसी ने बर्फीला पानी
उड़ेल दिया हो,,,,,,,,,
राजेश सिन्हा
27/02/13

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