अजीब आलम था वो
दिन के उजालों में ही
कुछ ख्वाब बुन लिए थे मैंने
रफ्ता रफ्ता
उनके करीब भी जा पहुंचा
मानो/ मुट्ठी में कैद
हो गए हों
चंद लम्हे
थम सा गया था
वक़्त/की अचानक
यादों ने बगावत का
बिगुल फूंक दिया
जैसे/कंपकपाती ठंड में
किसी ने बर्फीला पानी
उड़ेल दिया हो,,,,,,,,,
राजेश सिन्हा
27/02/13
दिन के उजालों में ही
कुछ ख्वाब बुन लिए थे मैंने
रफ्ता रफ्ता
उनके करीब भी जा पहुंचा
मानो/ मुट्ठी में कैद
हो गए हों
चंद लम्हे
थम सा गया था
वक़्त/की अचानक
यादों ने बगावत का
बिगुल फूंक दिया
जैसे/कंपकपाती ठंड में
किसी ने बर्फीला पानी
उड़ेल दिया हो,,,,,,,,,
राजेश सिन्हा
27/02/13
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